Friday, 31 March 2017
Saturday, 18 March 2017
My Favourite Poems #1 - प्रिये तुम्हारी सुधि को
प्रिये तुम्हारी सुधि को मेंने यूं भी अक्सर चूम लिया
तुम पर गीत लिखा फिर उसका अक्षर अक्षर चूम लिया
में क्या जानूं मन्दिर मस्जिद गिरजा या गुरूद्वारा
जिन पर पहली बार दिखा था अल्हण रूप तुम्हारा
मेंने उन पावन राहों का पत्थर पत्थर चूम लिया
प्रिये तुम्हारी सुधि को मेंने यूं भी अक्सर चूम लिया........तुम पर गीत
हम तुम कितनी दूर धरा से नभ की जितनी दूरी
फिर भी हमने साध मिलन की पल में कर ली पूरी
मेंने धरती को दुलराया तुमने अम्बर चूम लिया
प्रिये तुम्हारी सुधि को मेंने यूं भी अक्सर चूम लिया..........तुम पर गीत
प्रियतम सुधि की गंध तुम्हारी मेंने चूमी ऐसे
चरण अहिल्या ने रघुवर के चूम लिये थे जैसे
जैसे लकडी की मुरली ने मोहन का स्वर चूम लिया
प्रिये तुम्हारी सुधि को मेंने यूं भी अक्सर चूम लिया........तुम पर गीत
— श्री देवल आशीष श्रंगार रस कवि (Deval Ashish)
तुम पर गीत लिखा फिर उसका अक्षर अक्षर चूम लिया
में क्या जानूं मन्दिर मस्जिद गिरजा या गुरूद्वारा
जिन पर पहली बार दिखा था अल्हण रूप तुम्हारा
मेंने उन पावन राहों का पत्थर पत्थर चूम लिया
प्रिये तुम्हारी सुधि को मेंने यूं भी अक्सर चूम लिया........तुम पर गीत
हम तुम कितनी दूर धरा से नभ की जितनी दूरी
फिर भी हमने साध मिलन की पल में कर ली पूरी
मेंने धरती को दुलराया तुमने अम्बर चूम लिया
प्रिये तुम्हारी सुधि को मेंने यूं भी अक्सर चूम लिया..........तुम पर गीत
प्रियतम सुधि की गंध तुम्हारी मेंने चूमी ऐसे
चरण अहिल्या ने रघुवर के चूम लिये थे जैसे
जैसे लकडी की मुरली ने मोहन का स्वर चूम लिया
प्रिये तुम्हारी सुधि को मेंने यूं भी अक्सर चूम लिया........तुम पर गीत
— श्री देवल आशीष श्रंगार रस कवि (Deval Ashish)
Tuesday, 7 March 2017
Phirr woh hi. . .
Phirr wohh hi tumhari yaade,
Phir wohh hi aankhe nam…
Phirr wohh hi march ka mahina…
Phirr Wohh hi akele hum…
Aana...
Aana
Jab koi ummid naa ho,
Koi fariyaad naa ho…
Bhul chuka ho main,
Apna vajood…
Jab khud se bhi milne ki…
Fursat naa rahe…
Tab aana…
Khushnuma si raat ki tarah..
Ya sardiyo ki dhoop jaisi…
Pehli baarish ki mehek…
Aana jaise aayi thi…
Pehli baar…
Kabhi naa jaane ke liye..
Aana jab Phirr Vahi December ho..!!!
आना,
जब कोई उम्मीद ना हो,
जब कोई फरियाद ना हो,
भूल चुका हो मैं,
खुद अपना वजूद,
जब खुद से भी मिलने की,
फुरसत ना रहे…
तब आना,
खुशनुमा सी रात की तरह,
या सर्दियों की धूप जैसी,
जैसे पहली बारिश की महक,
आना जैसे आई थी,
पहली बार,
कभी ना जाने के लिए..
आना जब मेरे अच्छे दिन हो ।
Tum Bin...
Mausam ab bhi
Vaisa hi khushgawar hai…
Hawa me basant ki..
Ab bhi vahi mehek hai..
Vaisa hi hai sureela…
Ab sangeet fiza me…
Vaisi hi chal rahi hai…
Duniya jaisi thi..
Pichle saal..
Par ekk tumhare..
Naa hone se…
Meri duniya kitni badal gayi hai…
मौसम अब भी,
वैसा ही खुशगवार है
हवा में बसन्त की,
अब भी वही महक है
वैसा ही है सुरीला,
अब संगीत फिज़ा में..
वैसी ही चल रही है,
दुनिया जैसी थी
पिछले साल..
पर एक तुम्हारे
ना होने से,
मेरी दुनिया कितनी बदल गई है..!!!
बदले बदले से...
कुछ पुराने दोस्त
आए घर
काफी दिनों बाद
शादी के
बातें निकली तो
पुरानी कविताओं पर
रूक गई..
देर रात तक
खूब कविताओं का
दौर चला
जो कभी पहले,
काफी पहले लिखी थी..
रात सोते वक्त
उसने कहा
आज आप काफी
बदले बदले से लगे..!!!
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