Saturday, 10 June 2017

मैं और मेरी तनहाई

मैं और मेरी तनहाई 
अक्सर ये बातें करते है 
तुम अगर कविता लिखती 
तो कैसा होता 
तुम ये लिखती 
तुम वो लिखती 
तुम पहली मुलाकात लिखती 
तुम जुदाई की रात लिखती 
तुम शायद वो लिखती 
जो कभी कह नहीं पाई  
तुम शायद वो लिखती 
जो मैं कभी समझ नहीं पाया 

अपने अन्दर कितना कुछ 
छिपा रखा है तुमने 
कितना अच्छा होता 
अगर तुम लिखती।

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