मिट्टी की सौंधी खुशबू
जो छू जाती थी
अन्तर्मन को
अनगिनत यादें
जिनसे महक उठती थी
सारी दीवारें घर की
स्मृतियाँ जो
वाष्प बन कर उड़ गई थी
फिर से लबालब भर गई
मैं क्यूँ उसे फोन लगाऊँ
उसे भी तो याद होगा
कल शाम उज्जैन की पहली बारिश थीं ....
No comments:
Post a Comment