बादलों में छिपा रहा चाँद
पूरी रात
कल चौदहवीं की रात थी
मैं देखता रहा उसे
एकटक
और यूँ ही नींद आ गयी
फिर तुम आईं ख्वाब में
मुस्कुराई
मुझे नींद से जगाया भी
आखिर कल चाँद देख ही लिया मैंने
कल चौदहवीं की रात थी ...
" अभिषेक नागर "
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